भारत का ‘मास्क मैन’-कहानी एक मिथिला पेंटिंग कलाकार की

परिचय

कहते हैं आपदा में जो अवसर तलाश ले वही एक सच्चा इंसान है, और जो इन्हीं अवसरों में ज़िंदगी तलाश ले वही एक सच्चा कलाकार है। कोरोना वायरस और आर्थिक समस्याओं की मित्रता 2020 के मार्च महिने से ही प्रगाढ़ होती दिख रही है। कोरोना पूरे देश और दुनिया में कोहराम मचा रहा है, समाज का कोई वर्ग नहीं है जो इससे अछूता बचा हो । अगर कलाकारों की बात करें तो उनके लिये ज़िंदगी हमेशा से ज़रा मुश्किल रही है और कोरोना वायरस के परिणाम लॉकडाउन ने मुश्किलों को और बढ़ा दी है। लेकिन बिहार राज्य के मधुबनी के मिथिला पेंटिंग कलाकार रेमन्त कुमार मिश्रा ने इस चुनौती भरे समय में भी अपना हौसला नहीं खोया और अपनी कला से न सिर्फ अपने गाँव के लोगों को रोजगार दिया बल्कि उन सभी के पंख को एक नई उड़ान दी जो मिथिला पेंटिंग के रंगों से अपना जीवन रंगना चाहते हैं।

रेमन्त कुमार मिश्रा

मार्च 2020,जब कोरोना संक्रमितों की संख्या धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुँचने के रास्ते में थी, सरकार ने देश भर में लॉकडाउन लगाया और कोरोना नियमों को पालन करने की सख्त हिदायतें दीं। मास्क पहनना अनिवार्य हो गया क्योंकि वायरस से बचने के लिये मास्क पहनना ही एकमात्र उपाय था। इस आपदे की घड़ी में रेमन्त कुमार मिश्रा ने अपनी कला को कभी न भुलाने वाला आकार दे दिया। उन्होनें मिथिला पेंटिंग को मास्क पर उतारा और पेंटिंग के रंगों से ऐसी छटा बिखेरी की कुछ ही समय में वह और उनके बनाये मास्क सोशल मिडिया पर छा गये।अपने मास्क के माध्यम से कोरोना से लड़ने का जागरूकता अभियान चलाया। फिर क्या था फोन और सोशल मिडिया के माध्यम से मास्क खरीदने वालों की भीड़ लग गई और वह भारत के मास्क मैन के नाम से लोकप्रिय हो गये।

मास्क

मिडिया संस्थानों से बातचीत के क्रम में रेमन्त कुमार मिश्रा ने अपने मास्क मैन बनने के सफर को साझा किया। रेमन्त कुमार मिश्रा मिथिला के दिग्गज़ मिथिला पेंटिंग कलाकारों में शामिल हैं। उन्होनें इस कला को न सिर्फ अपना जीवन समर्पित किया है बल्कि इस कला को अपनी जीविकोपार्जन का भी साधन बनाया है।

कहते हैं एक कलाकार की असली पहचान एक कलाकार ही कर सकता है। मिश्रा जी के लिये मदद की सबसे बड़ी हाथ बनकर सामने आईं लेखक और समाजकर्ता अद्वैता काला। अद्वैता काला ने सोशल साइट टिव्टर पर रेमन्त कुमार मिश्रा के बनाये मास्क की व्याख्यां करते हुये लोगों से उनके बनाये हुये मास्क को खरीदने की अपील की। फिर क्या था कलाप्रेमियों और आम जन जमकर मास्क बनवाने के ऑडर देने लगे। एक समय ऐसा भी आया जब रेमन्त कुमार मिश्रा के घर में बस फोन की घँटियाँ सुनाई देने लगीं, ये घँटियाँ पूरे देश से आम लोगों की थीं जो उनके बनाये मास्क खरीदना चाहते थे।

मास्क

सफ़र की शुरूआत

2 जनवरी 1983 में बिहार के मधुबनी जिले से 3 कीलोमीटर दूर स्थित जितवारपूर गाँव में जन्में रेमन्त कुमार मिश्रा मिथिला पेंटिंग में खासा नाम हैँ। जिस गाँव से वह संबंध रखते हैं उस गाँव को मधुबनी पेंटिंग का केंद्र कहा जाता है। कहते हैं जितवारपुर गाँव में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो इस कला से अछूता हो। मिश्रा जी बताते हैं कि मिथिला पेंटिग की कला उन्हें विरासत में अपने पुर्वजों से प्राप्त हुई। उनकी दादी और माँ ने इस कला को परिवार में आगे बढ़ाया और आज रेमन्त कुमार मिश्रा मधुबनी पेंटिंग को दुनिया के हर कोने तक पहुँचाने का काम कर रहें हैं। मिश्रा जी बताते हैं कि बचपन में वह 1 रूपये के लिये अपनी दादी और माँ की पेंटिंग में मदद किया करते थे। उस वक्त यह बस उनके लिये महज़ एक मनोरंजन का साधन था परंतु जैसे-जैसे वह बड़े हुये उन्होनें अपने पुर्वजों की कला को अपना जीवन देने की ठानी। वह कहते हैं कि उन्होनें पहली बार जब पेंटिंग ब्रश अपने हाथ में पकड़ी तब उनकी उम्र मात्र दस साल थी। और तबसे लेकर आज तक रेमन्त कुमार मिश्रा ने अपने क्षेत्र को कई जगह प्रस्तूत किया है और मधुबनी पेंटिंग को प्रत्येक ऊँचाईंयों से भेंट करावाया है। वह कहते हैं, 1995 में उन्हें भारत सरकार के तरफ से 100 रूपये की CCRT छात्रवृति मिलती थी जो प्रयाप्त नहीं था। और इस तरह वह पेंटिंग को अपने जीवन यापन का साधन बनाने की ओर अग्रसर हुये।

मिश्रा जी मिथिला पेंटिंग को कई रोज़मर्रा की चीजों पर भी उतारते हैं और उसे लोगों तक पहुँचाते हैं। इधर कोरोना ने भारत में 2020 के मार्च में दस्तक दी और उधर मिश्रा जी ने 650 मास्क तैयार कर अपने जान-पहचान और सरकारी कर्मचारियों के बीच प्रतिपुष्टि( फीडबैक) के लिये मास्क बाँटे जहाँ उन्हें काफी सकारात्मक प्रतिक्रियायें मिली।लोगों ने पेंटिंग मास्क की काफी प्रशंसा की और रेमन्त कुमार मिश्रा के रचनात्मकता को दाद दिया। और इस तरह वह अब तक 9000 मास्क बना चुके हैं। और इतना ही नहीं मास्क बनाने के इस कार्य में उन्होनें अपने गाँव के लगभग सौ परिवारों को जोड़ कर उन्हें इस कोरोना काल में रोज़मर्रा का साधन मुहैया कराया है।

उपलब्धियाँ

रेमन्त कुमार मिश्रा की कला को बिहार सरकार ने 2014 में मधुबनी आर्टिस्ट स्टेट पुरष्कार से नवाज़ा। इससे पहले वह 2010 में गोवा में मिथिला पेंटिंग वर्क शॉप के माध्यम से गोवा सरकार द्वारा अवॉर्ड औफ ऑनर से सम्मानित हो चुके हैं। मिश्रा जी पॉन्डीचेरी वासियों का भी दिल जीत चुके हैं। उन्हें 2011 में पॉन्डीचेरी सरकार द्वारा बेस्ट डिसप्ले अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। दिल्ली के सुरजकुंड का इंटरनेशनल फेयर दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ प्रत्येक वर्ष दुनिया के कोने – कोने से कई कलाकार अपनी कला को प्रस्तूत करने आते हैं। यहाँ भी रेमन्त कुमार मिश्रा ने अपनी कला का परचम 2014 से 2018 तक लहराया। उन्होंने मधुबनी पेंटिंग को दुनिया के कई देशों के कलाप्रेमी दिये। लगातार तीन वर्षों तक(2016-2018) चाइना इंटरनेशनल आर्ट एंड क्राफ्ट टेस्ट में वह अपनी कला के रंग बिखेरते रहे। कोलंबो और सींगापुर में भी भारत देश और मधुबनी जिला का नाम गूँजता रहा। मिश्रा जी को 2012 में दिल्ली साहित्य कला सम्मान मिला जो कला के क्षेत्र में काफी मुल्य रखता है। उसी वर्ष वह हरियाणा टूरिज़्म अवॉर्ड से भी नवाज़े गये। रेमन्त कुमार मिश्रा कला की महत्ता को भली-भाँति पहचानते हैं इसलिये उनका मानना है कि बचपन से ही बच्चों को कला की सहजता और सुंदरता से भेंट कराना चाहिये। इसी उपलक्ष्य में वह लगभग 2000 छात्रों को छह स्कूलों में मिथिला पेंटिंग की ट्रेनिंग दे चुके हैं। युनायटेड आर्ट फेस्टिवल अवॉर्ड से सम्मानित रेमन्त कुमार मिश्रा भारत सरकार के जागरूकता अभियान में भी शामिल रह चुके हैं। वह सेव द टाइगर प्रोजेक्ट और सेव द पान्डा प्रोजेक्ट में भी अपनी कला से भागेदारी दे चुके हैं। स्वच्छता अभियान में भी मिश्रा जी का कला के माध्यम से खासा योगदान है।चाइना के कला त्योहारों में मिश्रा जी ने 4 बार शामिल होकर अपनी कला का लोहा मनवाया है।

गेस्ट हाउस, मधुबनी

रेमन्त कुमार मिश्रा की कला पर पूरे देश को गर्व है। अगर आप कभी मधुबनी आयें तो आपको इनका पहला काम रेलवे स्टेशन पर बने पेंटिंग्स में दिख जायेगा। मधुबनी के सरकारी गेस्ट हाउस की दीवार पर मिश्रा जी द्वारा बने सबसे बड़े बरगद के पेड़ की चित्रण देखने को बनती है। दीवारों पर इनके हाथों से बिखरी रंगो की छटा किसी चमत्कार से कम नहीं लगती।मधुबनी शहर की खासियत इन्हीं पेंटिंग्स से है और रेमन्त कुमार मिश्रा जी जैसे कलाकार इसे जीवित रख कर अपने क्षेत्र के सच्चे नागरिक होने का कर्तव्य निभा रहें है।

मास्क की बात

कोरोना काल में मास्क पहनने की जागरूकता फैलाने के साथ रेमन्त कुमार मिश्रा ने स्थानिये लोगों के रोजगार को ध्यान में रखते हुये मास्क बनाने की शुरूआत की। सूती कपड़े में बने तीन लेयर की मास्क जिसपर मिथिला पेंटिंग के कई आकृतियों को मिश्रा जी और उनकी टीम ने तैयार किया वो पहनने में काफी आरामदायक महसूस होती है। एक मास्क 50 रूपये में लोगों को दिया जाता है, जो काफी वहनिये (अफॉरडेबल) है। यही कारण है कि बड़े-बड़े नेता और बॉलिवुड के कलाकार उनके समर्थन में सोशल मिडिया के सहारे लोगों से मास्क खरीदने की अपील करने लगे। इस भीड़ में राजद नेता तेजस्वी यादव और हिन्दी फिल्म जगत की अभनेत्री रवीना टंडन का भी नाम जुड़ गया। दिवंगत पत्रकार रोहित सरदाना जी को भी रेमन्त कुमार मिश्रा जी उस मुश्किल की घड़ी में सहायता करने के लिये सत-सत नमन करते हैं। पेंटिंग में इस्तेमाल रंग भी वह प्राकृतिक रूप से बनाते हैं, जो स्वास्थ्य को किसी भी प्रकार की हानी पहुँचाने से कोसों दूर है। रंगों को नीम के पत्ते, पीपल की छाल,कच्ची हल्दी और कई प्रकार के फूलों से तैयार किया जाता है और उनका उपयोग मास्क पर विभिन्न तरह के सुंदर आकृतियों को उकारने में किया जाता है। मिश्रा जी ने मास्क पर कई जागरूकता के स्लोगन लिखकर लोगों में कोरोना के प्रति आगाह करने की भी पुरजोर कोशिश की है। गो कोरोना गो और भारत जीतेगा, कोरोना हारेगा जैसे जागरूक वाक्य से भी उन्होनें मास्क को सजाया है। और इस तरह वह मास्क मैेन के नाम से लोगों में प्रसिद्ध हैं।

रेमन्त कुमार मिश्रा इस संकट की घड़ी में न ही सिर्फ स्थानिये लोगों के लिये रोजगार का माध्यम हो रहें हैं बल्कि उन तमाम कला प्रेमियों के लिये एक उदाहरण के तौर पर सामने आ रहें हैं जो कला को अपनी जीवनऔर कमाई का आधारभूत मंत्र बनाना चाहते हैं।

अगर आप भी रेमन्त कुमार मिश्रा जी के इस कार्य से प्रभावित हैं और उनके बनाये मास्क को खरीदना चाहते हैं तो नीचे दिये गये मोबाइल नम्बर के माध्यम से उनसे सम्पर्क करें-

9899429912

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